एक बार कुछ जिज्ञासु ओशो के पास सत्संग के लिए पहुंचें. बातचीत के दौरान एक ने प्रश्न किया, ' क्या दान-पुण्य, तीर्थाटन, पूजा-पाठ इत्यादि साधनों से किये गये बुरे कर्मों से मुक्ति मिल सकती है?'
ओशो ने उत्तर दिया, 'अच्छे कर्म बुरे कर्मों को कभी काटते नही, बल्कि उनपर आच्छादित हो जाते है. बुरे और अच्छे, सभी कर्मों का फल मनुष्य को भोगना ही पड़ता है.'
ओशो आगे कहते है, 'यदि मनुस्य को विश्वास हो जाये की कर्मकांड आदि से बुरे कर्मों से मुक्ति मिल सकती है, तो वह उन बुरे कर्मों को निरंतर निर्भेय होकर करता रहेगा.वह सोचेगा की दावा की तरह दान देकर, पूजा पाठ करके, गंगा स्नान करके दुष्क्रत्यों से मुक्ति पा लेगा. फिर तो आदमी निर्भेय होकर लूट-पाट, हत्या, दबंगई, अनाचार, भ्रष्टाचार कर दूसरों का जीना दूभर कर देगा. जो यह कहते है की पाप कर्मों से छूट देने का रास्ता उनके पास है, वे स्वयं या तो पापी है, या फिर दूरों को भ्रमित करने वाले ठग.'
कुछ पल रूककर ओशो कहते है, ' किये गये बुरे कर्मों का दुष्फल काटने का कोई उपाए नही है.. कोई भी अच्छा कर्म बुरे कर्म की काट नही कर सकता. इसलिए यह द्रढ़ता से समझ लेना चाहिए की सदैव सत्कर्म करने में ही भलाई है. दान, सेवा, परोपकार आदि को भी अपना नियमित मानकर, मानवीय गुण मानकर करते रहना चाहिए.'
ओशो आगे समझाते है, 'दान-दक्षिणा लेकर स्वर्ग जाने का आशीर्वाद देने वाले संत निपट ठग और धूर्त व्यापारी के सामान है. इनसे बचने की नितांत आवश्यकता है.
Bahut bahut badhiya
जवाब देंहटाएंBahut bahut badhiya
जवाब देंहटाएंCan u tell the discourse name from which it extracted
जवाब देंहटाएंThanks