परिवार में सबसे छोटी थी और सबकी लाडली भी.मेरा बचपन सुख-सुविधाओं में बीता. जिंदगी को अपने हाथ में थामने को आतुर थी. पंख लगाकर उड़ना चाहती थी. सपनो की दुनिया में खोना मुझे अच्छा लगता था. इन्ही सपनो के बीच कैसे मेरा बचपन पीछे रह गया, पता ही नही चला. जवानी की दहलीज पर खडी लड़की की शादी की चिंता हर किसी को होती है, जैसे मेरे पिताजी को थी. बेटी सुखी रहे और खुशियों के आँगन में झूले, ये सोच उन्होंने मेरे लिए एक अदद वर की तलाश भी कर ली.