शुक्रवार, 6 मई 2011

धरती को बचने की नायाब पहल


अर्थ आवर डे
पृथ्वी पर बेहतर  पर्यावरण बनाये रखने के प्रति लोगो में जागरूकता पैदा करने के लिए ही प्रतिवर्ष दुनिया भर में अर्थ आवर डे  मनाया जाता है.


गुरुवार, 5 मई 2011

उसे मैं बेबस नही होने दूंगी.

परिवार में सबसे छोटी थी और सबकी लाडली भी.मेरा बचपन सुख-सुविधाओं में बीता. जिंदगी को अपने हाथ में थामने को आतुर थी. पंख लगाकर उड़ना चाहती थी. सपनो की दुनिया में खोना मुझे अच्छा लगता था. इन्ही सपनो के बीच कैसे मेरा बचपन पीछे रह गया, पता ही नही चला. जवानी की दहलीज पर खडी लड़की की शादी की चिंता हर किसी को होती है, जैसे मेरे पिताजी को थी. बेटी सुखी रहे और खुशियों के आँगन में झूले, ये सोच उन्होंने मेरे लिए एक अदद वर की तलाश भी कर ली.


बुधवार, 4 मई 2011

फैसला

काफी दिनों से चल रहे वाद-विवाद और द्वंद का कल शायद अंतिम दिन हो. कल मेरे आने वाले कल पर एक फैसला लिया जाएगा, जो पिछले छेह माह से घर में वाद-विवाद का विषय बना हुआ है. देखना ये है की ये फैसला परंपरागत रुढ़िवादी विचारधारा करते हुए बेटी के भविष्य को दाँव पर लगाएगा या अनावश्यक अहितकारी सामाजिक व मानसिक दबाव के विरुद्ध सशक्त हो बेटी के हित को प्राथमिकता देगा. यही सोचते-सोचते खुली आँखों में संशय व भय का अन्धकार लिए सारी रात बिता दी. अगले दिन सुबह नाश्ते की आवश्यकता किसी को न थी. सभी ड्राईंग रूम में एकत्रित हुए. शांत, उलझे चेहरे,  टकटकी लगाये पिताजी के मुख की ओर देख रहे थे. सभी के भावो और उत्सुकता को अधिक प्रतीक्षा न कराते हुए पिताजी ने कहा,

मंगलवार, 3 मई 2011

चमकता इंडिया, सिसकता भारत

जब लोगो में आतंकवाद का दर हो, नक्सलवाद समाज को दारा रहा हो, ऐसे में आज़ाद देश की बात करना बेमानी नही तो और क्या है. स्वतंत्रता पशचात जिस स्वर्णिम भारत की कल्पना लोगो के मन में थी, वह धराशायी होती जा रही है. राजनीति में बैठे लोग अपना स्वार्थ सिद्ध करने में लगे हुए है.

मदर्स डे

चीफ इंजिनियर , संजय कंसल, ऑफिस से आकर चाय नाश्ता कर रहे थे की उनकी पत्नी दीपाली ने सूचना दी कि आज गाँव से अम्माजी का पोस्टकार्ड भी आया है. कंसल साहब ने पत्र पढ़ा. माँ ने लिखा था ---

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