दुनिया का प्रत्येक व्यक्ति प्रसन्नता की खोज में भटक रहा है. जन्म से मृत्यु तक उसके जो भी कर्म होते है, वे प्रसन्नता प्राप्ति के लिए ही होते है. लेकिन वास्तविकता में उसके जीवन में ख़ुशी का हिस्सा बहुत कम आता है. दुनिअभर के भौतिक संसाधन एकत्रित कर लेने के बाद भी उसे प्रसन्नता नही मिलती है. असीमित धन दौलत एकत्रित कर लेने के बाद भी उसे शांति नही मिलती है, तो प्रश्न उठता है कि जिस ख़ुशी को पाने के लिए हमारे सारे कर्म होते है, फिर भी हमें ख़ुशी नही मिल पाती, ऐसा क्यों? इसका सीधा सा जवाब है कि ख़ुशी धन दौलत और भौतिक संसाधनों से प्राप्त नही कि जा सकती. अगर ऐसा होता तो ख़ुशी अमिईर लोगों के पास ही कैद होती, जबकि वास्तविकता में जो जितना अमीर है, वो उतना ही दुखी है. अगर ख़ुशी धन दौलत में होती तो विश्व के धनि देश अपनी साड़ी धन-दौलत छोड़कर भारत जैसे अध्यात्मिक देश में मानसिक शांति कि तलाश में नही भटकते. जिस ख़ुशी को हम जीवन भर बाहर खोजते है, वो कहीं और नही बल्कि हमारें भीतर ही होती है. ख़ुशी को बाहर खोजने वाले लोग दुनियाभर के भौतिक संसाधनों को एकत्रित कर लेने के बाद भी दुखी रहते है, जबकि ख़ुशी को अपने मन में खोजने वाले लोग, जिन्हें दो वक्त कि रोटी भी मुश्किल से मिलती है, उन्ही ख़ुशी मिलती है. अन्य कही पर जीवन भर खोजने पर भी ख़ुशी नही मिलेगी. जो ख़ुशी हमारी खो गयी है, वो बाहर नही हमारें मन में ही है.
इस संदेभ में एक कहानी है- एक बहुत ही अमीर व्यक्ति था. वह हमेशा दुखी रहता था. परेशान होकर वह अपने गुरूजी के पास गया. गुरूजी ने उसके दुखी होने का कारण पूछा तो उसने बताया कि गुरूजी! मेरे पास असीमित धन-दौलत है, फिर भी मैं खुश नही हु. आप बताइए कि मुझे ख़ुशी कैसे मिले? गुरूजी ने कहा कि कल तुम्हारे प्रश्न का उत्तर मिल जाएगा. वह अमीर व्यक्ति वहां से गुजर रहा था तो उसने गुरूजी को कुछ खोजते हुए देखा. वह रुका और गुरूजी से पूछने लगा, गुरूजी! आप यहाँ क्या खोज रहे है? गुरूजी ने कहा, मेरी चाबी खो गयी है, उसे खोज रहा हूँ. यह सुनकर वह अमीर आदमी भी रोडलाईट के नीचे चाबी खोजने लगा. बोहुत देर के बाद भी जब वो चाबी नही मिली तो उसने गुरूजी से कहा कि आपकी चाबी कहा खोई थी? गुरूजी ने कहा, मेरे कमरे में खोई थी, लेकिन वहां पर अँधेरा है और मेरी लालटेन में तेल नही है. इसलिए मैं मैं इस रोडलाईट के नीचे खोज रहा हु. यह सुनकर आदमी को जोर का झटका लगा. वह बोला, गुरूजी, आपकी चाबी अन्दर खोई थी और आप यहाँ खोज रहे है. गुरूजी ने जवाब दिया, तुम भी तो वही काम कर रहे हो, ख़ुशी तुम्हारे अन्दर छिपी है और तुम उसे बहार खोज रहे हो. इसलिए तुम दुखी हो. यह सुनकर वह अमीर आदमी गुरूजी के पैरों में पड़ गया और उसने गुरूजी को धन्यवाद करते हुए कहा कि गुरूजी! आपने मुझे जीवन का सबसे बड़ा सच से अवगत करा दिया है.
लेखक:- नितिन अग्रवाल, बुलन्द्शहर
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