बुधवार, 25 मई 2011

सुख की खोज

एक राजा था. बड़ा निडर और उदार. उसकी प्रजा उसे बहुत चाहती थी.एक दिन राजा एकांत में बैठा कुछ सोच रहा था. उसे लगा की इतनी सारी सुख निधि पाकर भी आदमी दुखी है, तो क्यों?



एक दिन उसने अपने दरबारियों को आज्ञा दी कि सबसे सुखी और तंदरुस्त आदमी लाओ. दरबारी और प्रजा हैरान. वे राजा कि आज्ञा का पालन करने के लिए बहुतेरे भटके. एक आदमी नही मिला. उन्होंने आकर राजा से कहा, " हे राजन! इस धरती पर पूर्ण सुखी और स्वास्थ्य कोई इंसान नही है. किसी को कोई दुःख है तो किसी को कोई."
सुनकर राजा स्तब्ध रह गया. फिर बोला, " तो क्या मेरे राज्य में सब दुखी और बीमार है? इस धरती पर कोई भी सुखी नही है. नही, ऐसा नही हो सकता. जाओ, एक बार फिर खोजो."
दरबारी क्या करते. फिर निकले. घूमते-घूमते वे एक निर्जन और वीरान जगह से गुजरे. देखा, एक संत ध्यान में लीन है. वे वही जाकर बैठ गये. ध्यान खुलने पर संत ने पूछा, " तुम लोग कौन हो? कहाँ से आये हो?"
दरबारियों ने कहा, "हम राजा कि आज्ञा से सुखी व्यक्ति को खोजने निकले है."
सुनकर संत बोले, " तुम्हे ऐसा कोई आदमी मिला?" दरबारियों ने मन कर दिया. इसके बाद साधू उनके साथ राजा के पास गये. राजा संत को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ.

संत ने कहा, "राजन, तुम व्यर्थ ही परेशान होते हो. क्या तुम्हे पता है कि मनुष्य के ह्रदय में ही सुख का अपार भण्डार पड़ा है. ज़रा टटोलो तो अपने को. सुख कि खोज में जैसे कस्तूरी मृग इधर-उधर भटकता है, वैसे ही तुम भी भटक रहे हो. सुख के लिए बहार नही, भीतर देखना होता है."
राजा का ह्रदय पुलक उठा. उसकी समस्या हल हो गयी.

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