रंजीत अपने अपने आप को हुस्न का सबसे बड़ा खिलाडी समझता था. कॉलेज के चक्कर लगाकर आती-जाती लड़कियों को छेड़ना, उनका पीछा करना, उसकी रोज़ की आदत हो गयी थी. और इस काम में उसका साथ देता था उसका दोस्त, सोनू. रंजीत को भगवान् से आकर्षक नैन-नक्श उपहार में मिला हुआ था. सॉलिड बॉडी और आकर्षक बहरी व्यक्तित्व से उसकी उम्र का पता ही नही चलता था. शायद यही वजह थी कि उसके झांसे में कुछ लड़कियां आसानी से आ जाती थी. शादी होने के बावजूद उसने कॉलेज के चक्कर लगाने बंद नही किये. इस हरकत को लेकर अक्सर रंजीत और उसकी पत्नी रीमा में लड़ाई-झगडे भी होते रहते थे, मगर रंजीत किसी की नही सुनता. आखिर तंग आकर रीमा ने अपनी बड़ी होती बेटी और बेटे को हॉस्टल में पढने के लिए डाल दिया. धीरे-धीरे उनकी शादी को बीस साल बीत गये. आज भी रंजीत हलके सफ़ेद होते बालों को डाई कर जवान दिखने की कोशिश में लगा रहता था.
रीमा की 18 साल की बेटी आज हॉस्टल से आ रही थी.उसने रंजीत को कह दिया था की आज बेटी आ रही है. अपने रंग-ढंग ठीक करलो. उस दिन वह रीमा की बात मानकर घर में रुक भी गया, तभी उसके दोस्त सोनू का फ़ोन आया, " अरे यार! घर पर क्या कर रहे हो? मेरी पत्नी मायके गयी हुई है. चल आज यूनिवर्सिटी चलते है. आज रिजल्ट आने वाला है. बहुत सारी लड़कियां आएँगी. चल आ जा, कुछ देर के लिए चलते है."
" नही! आज नही. बेटी आने वाली है." रंजीत ने मना कर दिया. पर सोनू कहाँ मानने वाला था. आखिर उसने जिद करके रंजीत को बुला ही लिया. रंजीत जरुरी काम का बहाना बनाकर घर से चला गया. शराब पीने के बाद दोनों यूनिवर्सिटी चल पड़े. कोने में खड़े आती-जाती लड़कियों को ताक रहे थे. तभी उनकी निगाह पेड़ के पास कड़ी दो लड़कियों पर पड़ी. मुंह पर स्कार्फ बंधा, चश्मा लगाये, वह बेहद स्मार्ट लग रही थी. दूसरी लड़की बाईक स्टार्ट कर रही थी, पर स्टार्ट नही हो रही थी. दोनों उनके पास पहुंचे. " क्या हुआ, कुछ खराबी है? मैं कोई हेल्प करू?" दोनों एक साथ बोले. "जी नही! कोई जरुरत नही है!" आगे वाली लड़की बोली. "ऐसा कीजिये, आप मेरे स्कूटर पर बैठ जाइए, मैं आपको घर छोड़ देता हूँ." ये कहते हुए सोनू पीछे से हंस रहा था.
"आप लोगो को शर्म नही आती, आती-जाती लड़कियों को छेड़ते हुए. चुपचाप यहाँ से चले जाओ वरना शोर मचाऊंगी" स्कूटर वाली लड़की बोली. साथ खड़ी दूसरी लड़की, जो स्कार्फ बांधे हुए थी, को देख सोनू बोला, "अरे मैडम! आप क्यों शांत है? आइये स्कूटर पर बैठिये. मैं आपको घुमा दूंगा." दोनों की हरकतों को देखते हुए उस लड़की से रहा नही गया और चेहरे से स्कार्फ सरकाते हुए बोली, चलिए कहाँ चलना है! मैं तैयार हूँ, पर पहले अपने पापा से इजाज़त ले लू. क्यों पापा. चली जाऊ " अब उसका सवाल रंजीत से था. अचानक सामने बेटी का चेहरा देख रंजीत ज़मीन फटने का इंतजार कर रहा था. आज भगवान् ने जो सबक सिखाया था, वो लाज़वाब था, क्यूंकि उसकी बेटी के सामने उसके कर्मों का खाता खुल गया था.
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