चीफ इंजिनियर , संजय कंसल, ऑफिस से आकर चाय नाश्ता कर रहे थे की उनकी पत्नी दीपाली ने सूचना दी कि आज गाँव से अम्माजी का पोस्टकार्ड भी आया है. कंसल साहब ने पत्र पढ़ा. माँ ने लिखा था ---
" बेटे संजय, तुम छोटे थे तो मेरा हर दिन ही नही, हर पल तुम्हारे लिए था. तुमने महीनो से मनी आर्डर नही भेजा. डॉक्टर कहता है कि माजी, दूध पिया करो फल खाया करो, मोतिया बिन्द का ऑपरेशन भी करने को कह रहे है. तुम्हारे पिताजी कि पेंसन से दाल रोटी खाकर पेट भरू या दूध-फल खाऊ. फिर बेटे तुमने एक खुबसूरत कार्ड भेज दिया. बेटे मुझे तो पता ही नही था. पूछा तो पता चला कि आज कल मदर्स डे मनाने का फैशन है. बेटे मै बूढ़ी इस कार्ड का क्या करू. शायद तुम्हारे शहर में ये रिवाज़ चालू हो गया है कि बूढ़ी माँ को साल में एक दिन कार्ड भेजकर रस्म पूरी करलो, पूरे साल बूढ़ी को मरने-खपने दो.हमने तो परिवार के हर सदस्य को पूरा वक़्त दिया था, अब तुम नए ज़माने वालो ने माँ के लिए भी एक सिं निशचित किया है. खैर, तुम और बहुरानी खुश रहो. अगले साल इस फालतू के कार्ड पर रूपये बर्बाद मत करना."
इंजिनियर कंसल साहब पत्र पढ़कर संकोच में पड़ गये. दो दिन तक पत्र को पढ़ा. आत्मग्लानि होती रही. बचपन याद करते रहे. दीपाली ने टोका, क्या अभी तक क्लब के लिए तैयार नही हुए? आज तो ब्रिज का फाइनल राउंड है, तुम्हे शील्ड मिलनी निशचित है. चलो, जल्दी करो. संजय बोले, " नही दीपाली शील्ड तो बहुत है, मैं तो आज रात कि ट्रेन से गाँव जा रहा हूँ. वैसे तो माँ स्वाभिमानी है, पर मुझे माफ़ कर देंगी तो मेरा प्रायश्चित हो जाएगा. डॉक्टर को फ़ोन कर अगले हफ्ते उनकी आँख का ऑपरेशन का अपॉइंटमेंट भी लेना है.दीपाली चुप हो गयी. कंसल साहब रात कि ट्रेन से गाँव जाने के लिए तैयारी करने लगे.
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें