जब लोगो में आतंकवाद का दर हो, नक्सलवाद समाज को दारा रहा हो, ऐसे में आज़ाद देश की बात करना बेमानी नही तो और क्या है. स्वतंत्रता पशचात जिस स्वर्णिम भारत की कल्पना लोगो के मन में थी, वह धराशायी होती जा रही है. राजनीति में बैठे लोग अपना स्वार्थ सिद्ध करने में लगे हुए है.
घोटालो की खबरें अब हमें नही चौकाती क्योंकि हम ऐसी खबरें देख-देख कर निष्क्रिय हो चुके है. प्रतिक्रिया दे भी तो क्या?? सेना के अफसर हो या समाज के ठेकेदार, हर कोई बस अपने बारे में सोच रहा है. एक तरफ भुखमरी से मरते बच्चे और दूसरी तरफ पिज्जा बर्गर की पार्टी देने वाले बच्चे, टूटी टपकती छत और जर्जर दीवारों के बीच पढने वाले बच्चे और एसी स्कूल में पढने वाले बच्चे. कितनी बड़ी खाई है इनके बीच. एक ओर शराब की पार्टियों में नोट उड़ाते अय्याश युवा तो दूसरी ओर नौकरी की तलाश और सिफारिश के अभाव में महीनो जूते घिसते युवा पीढ़ी. परिवार के पोषण की मज़बूरी के कारण देह व्यवसाय को अपनाने वाली स्त्री. और आगे बढ़ने व पैसे की बढती लालसा को मिटाने के लिए अपने को नख से शिख तक कैश कराने वाली नारी. कैसे इनको एक ही श्रेणी में रखें. एक और सर्व धर्म सम भाव व अखंड भारत के नारे लगाते जन नेता, दूसरी तरफ दलीय राजनीति व अपना वोट बैंक बढाने के लिए देश को धर्म व जातियों में विखंडित करने वाले ये रास्ट्र निर्माता है, जो अपनी तिजोरी भरने में ही लगे हुए है. ऐसे में हम आज़ाद भारत की कौन-सी तस्वीर देखें. गर्व करें तो किस पर?? क्या आज हमे ऐसी नीति की आवश्यकता नही है, जो भारत की सम्पूर्ण आबादी को खुशहाल करें, विकास व समृद्धि की और ले जाये, ना की अमीर-गरीब के बीच के खाई को बढ़ावा दे.
घोटालो की खबरें अब हमें नही चौकाती क्योंकि हम ऐसी खबरें देख-देख कर निष्क्रिय हो चुके है. प्रतिक्रिया दे भी तो क्या?? सेना के अफसर हो या समाज के ठेकेदार, हर कोई बस अपने बारे में सोच रहा है. एक तरफ भुखमरी से मरते बच्चे और दूसरी तरफ पिज्जा बर्गर की पार्टी देने वाले बच्चे, टूटी टपकती छत और जर्जर दीवारों के बीच पढने वाले बच्चे और एसी स्कूल में पढने वाले बच्चे. कितनी बड़ी खाई है इनके बीच. एक ओर शराब की पार्टियों में नोट उड़ाते अय्याश युवा तो दूसरी ओर नौकरी की तलाश और सिफारिश के अभाव में महीनो जूते घिसते युवा पीढ़ी. परिवार के पोषण की मज़बूरी के कारण देह व्यवसाय को अपनाने वाली स्त्री. और आगे बढ़ने व पैसे की बढती लालसा को मिटाने के लिए अपने को नख से शिख तक कैश कराने वाली नारी. कैसे इनको एक ही श्रेणी में रखें. एक और सर्व धर्म सम भाव व अखंड भारत के नारे लगाते जन नेता, दूसरी तरफ दलीय राजनीति व अपना वोट बैंक बढाने के लिए देश को धर्म व जातियों में विखंडित करने वाले ये रास्ट्र निर्माता है, जो अपनी तिजोरी भरने में ही लगे हुए है. ऐसे में हम आज़ाद भारत की कौन-सी तस्वीर देखें. गर्व करें तो किस पर?? क्या आज हमे ऐसी नीति की आवश्यकता नही है, जो भारत की सम्पूर्ण आबादी को खुशहाल करें, विकास व समृद्धि की और ले जाये, ना की अमीर-गरीब के बीच के खाई को बढ़ावा दे.
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