बुधवार, 4 मई 2011

फैसला

काफी दिनों से चल रहे वाद-विवाद और द्वंद का कल शायद अंतिम दिन हो. कल मेरे आने वाले कल पर एक फैसला लिया जाएगा, जो पिछले छेह माह से घर में वाद-विवाद का विषय बना हुआ है. देखना ये है की ये फैसला परंपरागत रुढ़िवादी विचारधारा करते हुए बेटी के भविष्य को दाँव पर लगाएगा या अनावश्यक अहितकारी सामाजिक व मानसिक दबाव के विरुद्ध सशक्त हो बेटी के हित को प्राथमिकता देगा. यही सोचते-सोचते खुली आँखों में संशय व भय का अन्धकार लिए सारी रात बिता दी. अगले दिन सुबह नाश्ते की आवश्यकता किसी को न थी. सभी ड्राईंग रूम में एकत्रित हुए. शांत, उलझे चेहरे,  टकटकी लगाये पिताजी के मुख की ओर देख रहे थे. सभी के भावो और उत्सुकता को अधिक प्रतीक्षा न कराते हुए पिताजी ने कहा,


" यह फैसला मेरे लिए ऐसा है जैसे की बच्चे से कहा जाये की वो अपने माँ या पिता में से एक का चयन करे. एक ओर मेरी सामाजिक मर्यादाएं और परम्पराएं है, तो दूसरी ओर मेरी बेटी का हित. एक ओर हमारी ही जाति का एक अयोग्य लड़का है और दूसरी ओर गैर-बिरादरी  परन्तु बेटी के लिए उसकी पसंद का सर्वोत्तम चयन है जो उसके सुखद भविष्य की गारंटी भी है. मेरी मान्यताएं गैर-बिरादरी के चयन से मुझे रोक रही है, परन्तु बेटी का प्यार, स्नेह और सुरक्षित भविष्य मुझे उसकी पसंद को अपनी पसंद बनाने के लिए बाध्य कर रहा है. सालों से चली आ रही विचारधारा के विरुद्ध एक नई सोच को अपनाना मेरे लिए वास्तव में कठिन है, परन्तु शायद बेटी का हित और उसकी ख़ुशी ही मेरी प्राथमिकता है. अतः मेरा फैसला उसके फैसले का समर्थन करता है. और मैं उसकी पसंद स्वीकार करता हूँ."

उनके  शब्दों ने मुझे चौंका दिया. सभी की आँखें भर आई और पिताजी ने मुझे गले लगा लिया. सच, उनका ये फैसला सबको चौंकाने वाला ही था.   


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