शुक्रवार, 6 मई 2011

धरती को बचने की नायाब पहल


अर्थ आवर डे
पृथ्वी पर बेहतर  पर्यावरण बनाये रखने के प्रति लोगो में जागरूकता पैदा करने के लिए ही प्रतिवर्ष दुनिया भर में अर्थ आवर डे  मनाया जाता है.




धरती के समक्ष मौजूद गंभीर चुनौतियों के प्रति लोगो को जागरूक और संवेदनशील बनाने के लिए दुनिया में हर संभव प्रयास किये जा रहे है. इसी तरह की कोशिश के तहत अर्थ आवर डे  यानी पृथ्वी घंटा दिवस का आयोजन दुनिया भर में किया जाता है.हर साल पृथ्वी पर बढ़ते खतरे के कारण, ये दिवस अधिक प्रासंगिक हो गया है. ये कार्यक्रम भारत में हर साल मार्च महीने के अंतिम शनिवार को वर्ल्ड वाईड फंड फॉर नेचर(डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) द्वारा आयोजित किया जाता है. इस दौरान रात ८:३० से ९:३० (8:30 से 9:30) बजे तक ( भारतीय समयानुसार) गैर-जरुरी प्रकाश को बंद कर दिया जाता है. साथ ही बिजली से चलने वाले उपकरण व मशीने भी बंद कर दी जाती है.भारत में भी अर्थ आवर डे मानाने का प्रचलन बढ़ा है. पिछले २६ मार्च को भारत में अर्थ आवर  मनाया गया. इस अभियान के तहत दुनिया के चार हज़ार से ज्यादा शहरो में एक घंटे तक बिजली नही जलाई गयी.

अर्थ आवर डे  की शुरुआत ऑस्ट्रेलिया की राजधानी सिडनी में 2007 में हुई थी. तब जलवायु परिवर्तन के प्रति ध्यान आकर्षित करने के लिया 22 लाख लोगों और 2000 से अधिक व्यावसायिक प्रतिष्ठानों ने घंटे भर के लिया बिजली बंद कर दी थी. इस नायब कोशिश को  पूरी दुनिया में न केवल सराहना मिली, बल्कि समर्थन भी मिला. पिछले साल केवल यूरोप और अमेरिका ही नही, बल्कि एशिया और अफ्रीका के 128 देशो ने अपनी विश्वप्रसिद्ध इमारतों और सार्वजनिक स्थलों को एक घंटे के लिए रौशनी से महरूम कर दिया.

वैसे इस दिवस के आलोचकों की संख्या भी कम नही है. इस प्रोद्योगिकी विरोधी करार दिया जाता है. आलोचकों का तर्क है किअगर ज्यादा लोग सिर्फ मोमबत्ती का इस्तमाल करेंगे तो यह पर्यावरण के लिए अवांछनीय होगा, क्योकि ज्यादातर मोमबत्ती पैराफिन से बनती है, जिसका आधार जीवाश्म ईंधन है. आलोचकों का मानना है की एक घंटा बिजली बंद करने की बजाये ध्यान इस बात पर केन्द्रित होना चाहिए की किस तरह जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता घटाकर सौर ऊर्जा स्रोतों का दोहन किया जाए.
 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

ShareThis