परिवार में सबसे छोटी थी और सबकी लाडली भी.मेरा बचपन सुख-सुविधाओं में बीता. जिंदगी को अपने हाथ में थामने को आतुर थी. पंख लगाकर उड़ना चाहती थी. सपनो की दुनिया में खोना मुझे अच्छा लगता था. इन्ही सपनो के बीच कैसे मेरा बचपन पीछे रह गया, पता ही नही चला. जवानी की दहलीज पर खडी लड़की की शादी की चिंता हर किसी को होती है, जैसे मेरे पिताजी को थी. बेटी सुखी रहे और खुशियों के आँगन में झूले, ये सोच उन्होंने मेरे लिए एक अदद वर की तलाश भी कर ली.
Tweetऔर कुछ दिन बाद मेरी शादी भी हो गयी. जिंदगी के साथ मैं अपने आने वाले कल के लिए सपने भी गढ़ने लगी. एक नए मेहमान के आने का इंतज़ार था. घर के सभी लोग बेसब्री से उस पल का इंतजार कर रहे थे. सबसे ज्यादा मैं उत्सुक थी, पर तभी अचानक जिंदगी ने करवट बदली. जिस बच्चे को मैंने जन्मा था वो विकलांग था. मन बड़ा दुखी हुआ. एक तो पहला बेटा और वो भी विकलांग. सारा शरीर सुन्न हो गया. शब्द, आवाज़, संवेदना सब जड़ हो गये. चकरा कर मैं वही गिर पड़ी. बाद में मुझे अपनों ने समझाया की आजकल हर रोग का इलाज है. इलाज करवाया, मन्नते मांगी, मगर कोई सुधार नही हुआ. मन रह-रहकर परमेश्वर को कोसता, मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ? दिन-रात परमेश्वर के आगे अपनी ममता का आँचल फैला आँखों से आँसुओ का समंदर जज़्ब किये अपने बेटे के ठेक होने की प्रार्थना करती रहती. भगवान् भी जैसे माँ की ममता और फ़र्ज़ की कठिन परीक्षा ले रहे थे. फिर मन के किसी कोने से आवाज़ आई, क्या हुआ अगर बेटा विकलांग है!! उसके साथ जिंदगी को जियो और उसे जीने का मकसद दो......
फिर क्या था, मैं बेटे के जीवन को सवारने में लग गयी. वो पढने में काफी होनहार था, सबकुछ भूलकर उसकी पढाई में मदद करने लग गयी. नर्सरी से अपनी हर परीक्षा में प्रथम आने वाला मेरा बेटा अपनी पाठशाला का गौरव, अपने दोस्तों, अध्यापकों का चहेता, परिवार जानो को आँखों का तारा बन गया.उसकी इस प्रतिभा को देख मुझे आगे जीने का मकसद मिल गया. पैरों से लाचार वो हर काम में सफल होने की कोशिश करता है. चलने में उसे असफल देख मेरा मन उदास भी होता है. जब उसके हमउम्र बच्चो को बीके चलते देखती हूँ, तो मन में कसक-सी उठती है. पल-पल उसके दर्द को महसूस करती हूँ. पर असहाए बेबस उसके दर्द को उससे छीन नही पाती. मगर अब मैं द्रढ़ प्रतिज्ञ हो गयी हूँ, उसकी ज़िन्दगी के प्रति.उसकी विकलांगता को कभी भी सपने पर हावी नही होने दूंगी. कहते है जब तक सांस है, तब तक आस है. शायद कोई चमत्कार हो जाये, इसकी प्रतीक्षा तो आज भी है, लेकिन उसे पढ़ा लिखा कर इस काबिल बनाना है कि उसकी उसकी कमजोरी ही उसकी ढाल बन जाए.

chinta ki koi bat nahi hai,viklang hona aek prkrti ki lila hai ,viklang ko aap sangit vidya se jod sekte hai sangit ka bajar bhut bada hota hai,parthvi par bahut sare kam hai jo aek viklang aasani se kar sakta hai
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